विमुक्त, घूमंतू और अर्ध्दघुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र की परंपरा

Sun 06-Apr-2025,01:07 AM IST +05:30

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विमुक्त, घूमंतू और अर्ध्दघुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र की परंपरा विमुक्त, घूमंतू और अर्ध्दघुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र की परंपरा
  • सन् 2014 के बाद से भारत सरकार ने विधिवत् इनकी सुध ली और आगे इनके उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए भगीरथ प्रयास प्रारंभ हुए। 

  • मध्य भारत छत्तीसगढ़ और राजस्थान सहित विभिन्न प्रदेशों में इनके द्वारा स्थापित मूर्तियां और मंदिरों में नवरात्र का महापर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। 

Madhya Pradesh / Jabalpur :

भारत में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू जनजातियों की देवी उपासना और नवरात्र की परंपरा और मान्यताएं हिंदू धर्म की धरोहर हैं।  ये जनजातियां आदिशक्ति के विभिन्न स्वरूपों को शिरोधार्य करती हैं इसलिए हिंदू धर्म का अविभाज्य हिस्सा हैं। महादेवी माँ काली और महाविद्या माँ बगलामुखी की उपासना की प्रमुखता है,तो वहीं परिवारों में कुल देवियों का महात्म्य है। 

मध्य भारत छत्तीसगढ़ और राजस्थान सहित विभिन्न प्रदेशों में इनके द्वारा स्थापित मूर्तियां और मंदिरों में नवरात्र का महापर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। गौरतलब है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी मां तुलजा भवानी थी इसलिए पिंडारी भी मां तुलजा भवानी की उपासना करते थे, वहीं ठगों में महाकाली की उपासना की प्रधानता थी।

ठगों में तो यह विशेष बात थी कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म और जाति का क्यों ना हो वह महाकाली की ही उपासना करता था। संपूर्ण भारतवर्ष में छत्तीसगढ़ के रायपुर में बंजारी माता का मंदिर बंजारों की कुलदेवी का मंदिर है जो मां बगलामुखी देवी के रूप में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार पूरे भारतवर्ष में यत्र- तत्र- सर्वत्र देवी उपासना और नवरात्र का महापर्व मनाया जाता है।

परंतु कितना दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि सनातन के  ध्वजवाहक, रेशम महापथ के उत्कृष्ट व्यापारी, देश के स्वतंत्रता संग्राम में पूर्णाहुति देने वाले विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध घूमंतू जनजातीय परिवार सदियों से रह रहे अपने ही भारत देश में पराए हो गए, न ठीक से नागरिकता मिली, न आधार कार्ड,न मतदान का अधिकार, न आवास और न ही सुविधाएं? और मुस्लिम और ईसाई घुसपैठिए देश के अल्पसंख्यक सुविधा भोगी नागरिक बन गए और तो और भगोड़े रोहिंग्या मुसलमान भी देश के नागरिक बन गए।

सन् 2014 के बाद से भारत सरकार ने विधिवत् इनकी सुध ली और आगे इनके उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए भगीरथ प्रयास प्रारंभ हुए। देश की इनकी जनसंख्या 2011 में 15 करोड़ थी अब तो 20 करोड़ हो गई होगी। अंग्रेजों ने 53 देशों में शासन किया परंतु केवल भारत की घुमंतू जातियों के लिए "क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871" पारित करके इन्हें आपराधिक जनजाति बना दिया क्योंकि इन घूमंतू जनजातियों ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया था।

गौरतलब है कि पिंडारी और ठगों ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया है इसलिए अंग्रेजों ने इनका सर्वनाश करने के लिए षड्यंत्र रचने कर जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। विडंबना तो देखिए कि बरतानिया सरकार के सुर में सुर मिलाकर वामपंथी और तथाकथित सेक्यूलर इतिहासकारों ने भी इनको अपराधी मानकर इतिहास लिख डाला। अब सही इतिहास लिखने का समय आ गया है। घूमंतू जातियों का बहुत ही गौरवशाली इतिहास है , जो समय-समय पर सामने आ रहा है । धार्मिक दृष्टि से पूरे भारत में घूमंतू जातियों ने हिंदू धर्म की न केवल रक्षा की है वरन मूर्तियां और मंदिरों की स्थापना भी की है। विमुक्त ,घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र पर्व का विशेष महत्व है।

इतिहास साक्षी है कि महाराष्ट्र के धाराशिव जिले में स्थित तुलजापुर ,एक ऐसा स्थान जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी माँ तुलजा भवानी स्थापित हैं, जो आज भी महाराष्ट्र व अन्य राज्यों के कई निवासियों की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मध्य प्रदेश में भी खंडवा के पास तुलजा भवानी का मंदिर है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निर्देशन में पिंडारियों ने मुगलों की खटिया खड़ी कर दी थी और तुलजा भवानी को अपनी कुलदेवी ही मानते थे। पिंडारियों ने बरतानिया सरकार के खिलाफ भी भारत की स्वाधीनता के लिए मरते दम तक संघर्ष किया था, जिसका इतिहास अतीत के गर्भ में है जो शीघ्र ही सामने आएगा।

ठगों में महाकाली की उपासना का बड़ा ही ऐतिहासिक और पौराणिक उपाख्यान जुड़ा हुआ है।ठगों की मान्यता है कि जब महाकाली ने रक्तबीज का वध किया तो अपने हाथों के पसीने से दो मनुष्यों का निर्माण किया और उन्हें एक-एक रुमाल दिया जिससे उस राक्षस को समाप्त किया जाए ,परंतु एक बूंद भी रक्त की पृथ्वी पर ना गिरे। महाकाली ने प्रसन्न होकर वह रुमाल उनके पास ही रहने दिया जिससे वह अपना जीवकोपार्जन कर सकें,और साथ ही देवी ने अपना एक दांत निकाल कर दिया जिससे वह अपनी रक्षा और शिकार कर सकें। यह कुदाली नाम के शस्त्र के नाम से जाना जाता है, जो आगे चलकर किसानी में खुदाई का उपकरण बना। ठगों ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया ,इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें चोर -लुटेरे बता फांसी पर लटका दिया। उल्लेखनीय है कि ठगों ने कभी किसी असहाय और बेबस को नुकसान नहीं पहुंचाया ।

छत्तीसगढ़ के रायपुर और मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के बंजारी माता का मंदिर पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। छत्तीसगढ़ के रायपुर का बंजारी माता का मंदिर पूरे भारत के बंजारों की कुलदेवी के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है , जो मां बगलामुखी की प्रतिमूर्ति है।
मंदिर परिसर में भगवान विष्णु, भगवान शिव (बंजारेश्वर महादेव), श्री राम, गणेश, हनुमान आदि के उप-मंदिर हैं। 

बंजारी माता का प्राकट्य बंजर भूमि से माना जाता है। बंजारी माता के मंदिर विभिन्न स्थानों पर पाए जाते हैं जहां वर्ष भर देवी की उपासना और नवरात्र का महापर्व बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है।

व्यापारिक दृष्टि से रेशम महापथ पर जब बंजारे व्यापार करने जाते थे , तब विदेश में भी बंजारी माता की स्थापना करते थे। 10वीं सदी के पहले से इनके पूजन एवं स्थापना होती चली आ रही थी, परंतु बाद में इस्लामी आक्रांताओं ने इन्हें विनष्ट कर दिया। बंजारी माता एक देश से दूसरे देश तक व्यापार करने वाले बंजारा समाज के ठीये और दिशा दिग्दर्शिका के रूप में स्थापित की  जाती थीं। अधिकतर बंजारी माता की प्रतिमाओं और उनके मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर ही मिलेगा। वे सूर्य उपासक हुआ करते थे। जंगलों व रास्तों में भटकने वालों को दिशाओं का ज्ञान भी इन मंदिरों के माध्यम से उपलब्ध हो जाता था। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की चारों दिशाओं में माता बंजारी के दरबार हैं। गोसलपुर, मंडला रोड की घाटी, तेंदूखेड़ा की पहाड़ी, सिवनी के गणेशगंज की दुर्गम पहाड़ी पर इनके दरबार आज भी आस्था का केंद्र हैं।

महाकौशल क्षेत्र में दिवालों  में मरही, बंजारी और भूलन माता कुल देवी, के रूप में पूजी जाती हैं।जय हो मरही माता, जय-जय बंजारी माई की…जय बोलो भूले की शक्ति, भूलन माई की जय हो, …कुछ ऐसे ही जयकारे नवरात्र के दिनों लोगों के घर में बने देवी दिवालों में प्रतिदिन सुबह शाम सुनाई दे जाते हैं। नवरात्रि में भले ही माता के नौ रूपों की व्याख्या व पूजन का विधान है, लेकिन श्रद्धालु अपने कुल देवी देवताओं का पूजन पहले करते हैं। ये परम्परा सदियों पुरानी है। इनका निर्वहन आज भी पूरी आस्था के साथ किया जा रहा है।

महाकौशल और बुंदेलखंड में पथिकों को राह दिखने वाली देवी भूलन माता के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रमाण के लिए जबलपुर में भूलन देवी माता के दो स्थान हैं। पहला कठौंदा गांव के पीछे बना भूलन देवी दरबार, दूसरा संजीवनी नगर से लगे भूलन गांव की मढिय़ा में माता विराजमान हैं। यह प्रतिमाएं आठवीं और नवी शताब्दी से विद्यमान है ।भूलन गांव का दरबार दक्षिण दिशा की ओर जाने वालों का मार्ग तय करता था। कठौंदा वाला दरबार उत्तर दिशा को प्रदर्शित करता था। जंगलों में जानवरों का भय आदि होता था, ऐसे में यहां से गुजरने वालों के रात्रि विश्राम स्थल व साधना केंद्र भी होते थे।

हर समाज में गोंडी परम्परा की पूजा विधि सम्मिलित हो गई है। कालांतर से जो लोग यहां निवास कर रहे हैं, उन सभी समाजों में भले ही पूजन विधि कितनी अलग हो, लेकिन थोड़ी बहुत गोंडी परंपरा की पूजा विधि सभी में शामिल है। बाना छेदन, खप्पर आरती, नींबू रस की धार, आटा की खीर ये सब जनजाति परम्पराओं में आते हैं।

मरही माता, खेरदाई और खप्पर वाली के उपासक सर्वाधिक
महाकौशल और बुंदेलखंड क्षेत्र में   हैं। सदियों से इन क्षेत्रों में स्थानीय व लोक परंपरा में पूजे जाने वाले देवी- देवता जनसाधारण के कुल देवी -देवता हैं। यही कारण है कि यहां शास्त्रों में बताए गए देवी देवताओं की अपेक्षा इनके मंदिर व दरबार सबसे अधिक हैं। घरों के देवी दरबारों में मरही माता, खेरदाई, खप्पर वाली, वनदेवी के दरबार बने हैं। यहां मंत्रों के बजाय तंत्र पूजन होता है। इनकी पूजन विधि पूर्वजों द्वारा तय परम्परानुसार किया जाता है। कहीं जवारे बोने के साथ बाना भी पूजा जाता है। कहीं खप्पर आरती की परम्परा पीढिय़ों से चल रही है। यही तो एक भारत , समरस भारत और श्रेष्ठ भारत की पहचान है।

डॉ. आनंद सिंह राणा राणा,

श्रीजानकीरमण महाविद्यालय एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत।