परिसीमन (Delimitation) क्या है? क्यों किया जाता है यह?
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जनसंख्या वृद्धि: समय के साथ विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ती या घटती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असंतुलित हो जाती है। परिसीमन से इस असमानता को ठीक किया जाता है।
परिसीमन की प्रक्रिया को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से संपन्न करने के लिए भारत सरकार परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन करती है। इसके निर्णयों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
1976 में जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए संसद ने 2001 तक परिसीमन को स्थगित कर दिया।
दक्षिण भारत के राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना) ने परिवार नियोजन नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम रही।
यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उनकी लोकसभा सीटों की संख्या घट सकती है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
परिसीमन (Delimitation) क्या है?
परिसीमन (Delimitation) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों की सीमाओं को पुनः निर्धारित किया जाता है। यह प्रक्रिया जनसंख्या में हुए बदलावों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों को संतुलित करने के लिए की जाती है।
परिसीमन क्यों किया जाता है?
जनसंख्या वृद्धि: समय के साथ विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या बढ़ती या घटती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असंतुलित हो जाती है। परिसीमन से इस असमानता को ठीक किया जाता है।
समान प्रतिनिधित्व: यह सुनिश्चित करता है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग समान संख्या में मतदाता हों, जिससे हर नागरिक की वोटिंग शक्ति समान हो।
संविधानिक बाध्यता: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत, हर जनगणना के बाद परिसीमन आयोग द्वारा संसदीय और विधानसभा सीटों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है।
परिसीमन आयोग (Delimitation Commission)
परिसीमन की प्रक्रिया को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से संपन्न करने के लिए भारत सरकार परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन करती है। यह आयोग राष्ट्रपति के आदेश से गठित किया जाता है और इसके निर्णयों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
भारत में परिसीमन का इतिहास
1952: पहली बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया।
1963, 1973, 2002: विभिन्न जनगणनाओं के बाद परिसीमन आयोगों का गठन हुआ।
1976: जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए संसद ने 2001 तक परिसीमन को स्थगित कर दिया।
2002: 84वें संविधान संशोधन के तहत परिसीमन आयोग ने 2008 में नई सीमाएँ तय कीं।
2026: अगला परिसीमन संभावित है, जिसमें राज्यों की लोकसभा सीटों की संख्या में बदलाव हो सकता है।
परिसीमन से जुड़ा विवाद
दक्षिणी राज्यों की चिंता: दक्षिण भारत के राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना) ने परिवार नियोजन नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम रही। यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उनकी लोकसभा सीटों की संख्या घट सकती है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
संघीय ढांचे पर प्रभाव: परिसीमन से संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की संभावना है, जिससे वे नीतिगत फैसलों में कम प्रभावशाली हो सकते हैं।
परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जो चुनावी क्षेत्रों को संतुलित करने के लिए की जाती है। हालांकि, यदि इसे केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाए, तो यह कुछ राज्यों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए, "निष्पक्ष परिसीमन" (Fair Delimitation) की मांग उठ रही है ताकि सभी राज्यों को समान अवसर मिले और संघीय ढांचे को मजबूती मिले।