उत्तर प्रदेश: जानलेवा हमले के मामले में विधायक अभय सिंह सहित 7 आरोपी बरी, 15 साल बाद आया फैसला
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15 मई 2010 को अयोध्या के महाराजगंज इलाके में विकास सिंह उर्फ विकास देवगढ़ पर जानलेवा हमला हुआ था। उन्होंने सपा विधायक अभय सिंह समेत सात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। आरोप था कि अभय सिंह और उनके साथियों ने सफारी गाड़ी से ओवरटेक कर स्कॉर्पियो पर अंधाधुंध फायरिंग की। इस घटना के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी और ट्रायल शुरू हुआ।
उत्तर प्रदेश: जानलेवा हमले के मामले में विधायक अभय सिंह सहित 7 आरोपी बरी, 15 साल बाद आया फैसला। 15 साल पुराने जानलेवा हमले के केस में सपा विधायक अभय सिंह समेत सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया गया है। इस मामले में कई कानूनी प्रक्रियाओं और फैसलों के उतार-चढ़ाव देखने को मिले।
15 मई 2010 को अयोध्या के महाराजगंज इलाके में विकास सिंह उर्फ विकास देवगढ़ पर जानलेवा हमला हुआ था। उन्होंने सपा विधायक अभय सिंह समेत सात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। आरोप था कि अभय सिंह और उनके साथियों ने सफारी गाड़ी से ओवरटेक कर स्कॉर्पियो पर अंधाधुंध फायरिंग की। इस घटना के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी और ट्रायल शुरू हुआ।
एमपी-एमएलए कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई अयोध्या की एमपी-एमएलए कोर्ट में हुई, जहां 2023 में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। इसके बाद वादी विकास सिंह ने हाईकोर्ट में अपील कर दी।
हाईकोर्ट में दो अलग-अलग फैसले
दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट की डबल बेंच में जस्टिस एआर मसूदी और जस्टिस अजय कुमार श्रीवास्तव ने अलग-अलग फैसले सुनाए। जस्टिस एआर मसूदी ने पुलिस की चार्जशीट, गवाहों के बयान और एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर अभय सिंह समेत पांच आरोपियों को 3 साल की सजा सुनाई और ₹5000 का जुर्माना लगाया। दूसरी ओर, जस्टिस अजय कुमार श्रीवास्तव ने अपील खारिज करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
चीफ जस्टिस ने केस ट्रांसफर किया
डबल बेंच के इस विरोधाभासी फैसले को देखते हुए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने मामला जस्टिस राजन राय की सिंगल बेंच को ट्रांसफर कर दिया। फरवरी 2025 में उन्होंने मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया और अब सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया है।
एफएसएल रिपोर्ट बनी मुख्य आधार
पुलिस जांच के मुताबिक, विकास सिंह की स्कॉर्पियो पर फायरिंग जरूर हुई थी, लेकिन गाड़ी पर मिले गोलियों के निशान और जब्ती प्रक्रिया में खामियां पाई गईं। घटना के 25 दिन बाद स्कॉर्पियो जब्त की गई, जिससे सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
यह मामला कानूनी पेचीदगियों, राजनीतिक दांव-पेंच और न्यायिक प्रक्रियाओं का अनूठा उदाहरण है। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया, जिससे 15 साल पुराना यह केस एक नए मोड़ पर आकर समाप्त हो गया।