चार दशक बाद मिला न्याय: दिहुली दलित नरसंहार के दोषियों को फांसी

Wed 19-Mar-2025,08:44 PM IST +05:30

ताजा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे Whatsapp Channel को Join करें |

Follow Us

चार दशक बाद मिला न्याय: दिहुली दलित नरसंहार के दोषियों को फांसी
  • 18 नवंबर 1981 की शाम फिरोजाबाद जिले के दिहुली गांव में 17 हथियारबंद डकैतों ने अचानक हमला कर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी थी। 

  • इस निर्मम हत्याकांड में 23 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि 1 व्यक्ति ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था। इस तरह कुल 24 दलितों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

  • मुकदमे के दौरान 13 आरोपियों की मौत हो गई, जबकि एक आरोपी अब भी फरार बताया जा रहा है।

  • यह मामला चार दशकों तक न्याय की लड़ाई लड़ता रहा और अब जाकर मैनपुरी कोर्ट ने दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।

  • हालांकि, दोषियों के पास अभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प बचा है, लेकिन निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाया जाना एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है। 

Uttar Pradesh / Mainpuri :

Mainpuri/ चार दशक पहले हुए दिहुली दलित नरसंहार मामले में आखिरकार न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। मैनपुरी कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने मंगलवार को तीन दोषियों—कप्तान सिंह, राम पाल और राम सेवक—को फांसी की सजा सुनाई है। साथ ही, अदालत ने इन तीनों पर 50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

क्या था दिहुली नरसंहार?

18 नवंबर 1981 की शाम फिरोजाबाद जिले के दिहुली गांव में 17 हथियारबंद डकैतों ने अचानक हमला कर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी थी। इस निर्मम हत्याकांड में 23 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि 1 व्यक्ति ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था। इस तरह कुल 24 दलितों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

घटना के बाद स्थानीय निवासी लैइक सिंह की तहरीर पर मामला दर्ज किया गया। पुलिस जांच में गिरोह के 17 डकैतों को आरोपी बनाया गया, जिसमें कुख्यात अपराधी और गिरोह के सरगना संतोष सिंह (उर्फ संतोसा) और राधेश्याम (उर्फ राधे) भी शामिल थे। हालांकि, मुकदमे के दौरान 13 आरोपियों की मौत हो गई, जबकि एक आरोपी अब भी फरार बताया जा रहा है।

राजनीतिक हलचल और न्याय की लड़ाई

इस वीभत्स हत्याकांड के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी। वहीं, विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने दिहुली से सादुपुर (फिरोजाबाद) तक पैदल यात्रा कर पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की थी। यह मामला चार दशकों तक न्याय की लड़ाई लड़ता रहा और अब जाकर मैनपुरी कोर्ट ने दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है।

कोर्ट का फैसला और प्रतिक्रिया

इस फैसले पर शासकीय अधिवक्ता रोहित शुक्ला ने कहा, "चार दशक बाद आखिरकार पीड़ित परिवारों को न्याय मिला है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है, जिससे समाज में यह संदेश जाएगा कि कोई भी अपराधी कानून से बच नहीं सकता।"

हालांकि, दोषियों के पास अब उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प मौजूद रहेगा। लेकिन पीड़ित परिवारों ने इस फैसले को न्याय की जीत बताया है। उनका कहना है कि इतने वर्षों के इंतजार के बाद उन्हें सच्चा न्याय मिला है, जो यह दिखाता है कि अपराधी कितने भी ताकतवर क्यों न हों, कानून के हाथ लंबे होते हैं।

क्या यह न्याय अंतिम है?

हालांकि, दोषियों के पास अभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प बचा है, लेकिन निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाया जाना एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है। यह निर्णय न केवल पीड़ित परिवारों के लिए राहतभरा है, बल्कि यह एक कड़ा संदेश भी देता है कि अन्याय और बर्बरता का अंत निश्चित है।

चार दशक बाद आए इस फैसले ने न केवल पीड़ितों को न्याय दिलाया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अन्याय पर विजय अवश्य मिलती है।